पिछले पांच सालों में फल और सब्जियों का उत्पादन अनाज के उत्पादन से ज़्यादा रहा है।

किसानों के लिए मौका है कि आम के आम, गुठलियों के दाम वाली इस पद्दति में हिस्सा लें। देश के कई हिस्सों के खेतों में बदलाव की एक किरण दिखाई दे रही है।

पिछले पांच सालों में फल और सब्जियों का उत्पादन अनाज के उत्पादन से ज़्यादा रहा है। 2017 के कृषि मंत्रालय के अग्रिम अनुमानों के अनुसार इस साल भी वैसा ही होगा। 2016-17 में 28.73 करोड़ टन फलों और सब्जियों के उत्पादन की सम्भावना है जो पिछले वर्ष की तुलना में 10 लाख टन ज्यादा है।

फूड प्रोसेसिंग क्षेत्र की कंपनियों की मांग को देखकर इन फलों को ज़्यादा उगाया जा रहा है। जैसे-जैसे लोग जूस और फलों के स्वाद वाले आइसक्रीम, दूध, दही और दूसरे प्रोडक्ट इस्तेमाल कर रहे हैं, फलों का उत्पादन अब फैक्ट्रियों के रास्ते होकर आम लोगों तक प्रोडक्ट के रूप में पहुंच रहा है।

जैसे-जैसे किसान और कंपनियां एक दूसरे की ज़रूरतों को पूरा कर रही हैं, धीरे-धीरे अब सर्कुलर इकोनॉमी या एक वृत्ताकार अर्थव्यवस्था तैयार हो रही है। इसका सीधा फायदा किसानों को हो रहा है क्योंकि उनके उत्पाद को खरीदने के लिए अब कंपनियां भी तैयार हैं।

इस वृत्ताकार अर्थव्यवस्था में किसानों को खेती के नए तरीके सिखाती है। उसके बाद उनके उगाये गए फलों को कंपनियां खरीद लेती हैं। उन फलों को फैक्ट्रियों के अलग-अलग रूप में तैयार किया जाता है। ऐसे प्रोडक्ट को बेचने के लिए कंपनियां ग्राहकों तक अपने विज्ञापन और दूसरे सन्देश लेकर जाती है। जैसे-जैसे फलों के स्वाद वाले नए प्रोडक्ट की मांग बढ़ती है, किसानों को और फल उगाने के लिए प्रोत्साहन मिलता है। वृत्ताकार अर्थव्यवस्था में हिस्सा लेने के लिए सभी कृषि कॉलेज और यूनिवर्सिटी को भी किसानों को उसके लिए प्रोत्साहित करना होगा। किसानों को नया बाजार मिलता है, कंपनियों को नए प्रोडक्ट के लिए ग्राहक और फिर किसानों तक फायदा पहुंचता है।

पिछले कई सालों से कोका-कोला किसानों के साथ काम कर के उनके फलों के उत्पाद को खरीद रहा है ताकि उसका इस्तेमाल अपने जूस और दूसरे पेय के लिए कर सके। उन्नति नाम के इस प्रोजेक्ट को 2011 में जैनइरीगेशन नाम की कंपनी के साथ शुरू किया गया था। इस कोशिश के शुरू होने के बाद अब किसानों के लिए उसके कई फायदेमंद पहलू दिखाई देने लगे हैं।

आम उगाने का नया तरीका

आम किसानों के लिए उन्नति के तहत सबसे पहले पेड़ लगाने के तरीके को बदला गया। आम के ऊंचे पेड़ों की जगह अब उन्हें पौधों की तरह लगाया जाता है। अल्ट्राहाईडेंसिटी प्लांटेशन (यूएचडीपी) तरीके से लगाए जाने वाले पेड़ के कारण किसानों की ज़मीन पर पहले के मुकाबले दस गुना ज़्यादा पेड़ तक लगाए जा सकते हैं, जिसका पूरा फायदा उन्हें मिलता है।

पेड़ों को करीब छह फुट की ऊंचाई से बढ़ने नहीं दिया जाता है। इससे आम होने पर उन्हें तोड़ने में ज़्यादा समय नहीं लगता है। पकने के बाद आम ज़मीन पर ज़्यादा ऊंचाई से नहीं गिरते हैं जिससे उनके खराब होने का डर ख़त्म हो जाता है। बढ़ते पेड़ों को उस ऊंचाई तक पहुंचने के बाद काट दिया जाता है ताकि वो और बड़े नहीं हो सकें। इस तरह आम के पेड़ों के बागान की जगह ऐसे यूएचडीपी तकनीक वाले आम के पौधों के बागान बन जाते हैं।

आम के पौधों को ड्रिप सिंचाई के तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। परम्परागत तरीके की तुलना में ड्रिप सिंचाई में प्रयोग किये जाने वाले पानी की मात्रा करीब आधी हो जाती है। इससे किसानों को अपने खेतों में पानी देना आसान तो होता ही है, साथ ही पानी का ज़्यादा इस्तेमाल नहीं होता है। आम के पौधों को जो भी खाद चाहिए उसे देने के लिए भी ड्रिप सिंचाई का ही प्रयोग होता है।

आम के पौधे रोपने के 3-5 साल के बाद उस में फल आना शुरू हो जाता है। परम्परागत तरीके से लगाए जाने वाले पेड़ में इस में आठ साल तक लग जाते हैं। इसलिए किसानों को अपने लगाए गए पैसे पर कमाई जल्दी होने लगती है। वृत्ताकार अर्थव्यवस्था का सबसे बढ़िया उदाहरण है कोका-कोला का प्रोडक्ट माज़ा। करीब 10 साल पहले जब कंपनी ने किसानों के साथ काम करना शुरू किया था तो बाजार बहुत छोटा था। अब आम के गुद्दे के लिए बाजार तेज़ी से बढ़ रहा है और आम के जूस अलग अलग ब्रांड के नाम से ग्राहकों तक पहुंचाया जा रहा है। किसानों को अनाज उत्पादन में भले ही मुश्किलें हो रही हैं लेकिन फलों के उत्पादन से उन्हें पैसे भी तुरंत मिल जाते हैं।

माज़ा के लिए तोता परी और हापुस आम का इस्तेमाल किया जाता है। पिछले दस सालों में उनकी कीमतों में भी करीब चौगुना बढ़ोत्तरी हुई है। और उससे भी फायदा किसान को हुआ है।

किसानों को ये फायदे सिर्फ आम उगाने से नहीं हुए हैं। फलों के गुद्दे युक्त मिनट मेड ओरेंज पल्पी के अब दस साल हो गये हैं। फैंटा ने संतरा युक्त फ्लेवर जोड़ा है जिसमें फल के जूस का 5.3 फीसदी मिलाया गया है। फैंटा के हरे आम की श्रेणी में 10 फीसदी फलों का जूस है। हाल ही में मिनट मेड का मौसमी भी बाज़ार में आया है। कोका-कोला देश में फल खरीदने वाली सबसे बड़ी कंपनी है और हर साल 2,00000 टन फल खरीदती है और वो ऐसे ही प्रोडक्ट के लिए इस्तेमाल होता है।

अब अलग-अलग जगहों के स्वादिष्ट फलों के जूस को भी शायद लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश के दश हरीया बिहार के लंगड़ा और बंगाल के मालदा के स्वाद वाले आमर सभी लोगों तक पहुंचाया जा सकता है।

इन सभी से अलग-अलग जगह के किसानों को अपने उत्पाद को कंपनियों को बेचने का मौका मिलेगा। उसके बाद भी वृत्ताकार अर्थव्यवस्था का एक अहम्हिस्सा होगा जब शिक्षण संस्थान किसानों और कंपनियों को एक दूसरे के साथ काम करने में मदद कर सकेंगे। चूंकि ये संस्थान किसानों के हित में काम करते हैं वो दोनों पक्षों को एक दूसरे की ज़रूरतों के बारे में बहुत बढ़िया तरीके से समझा सकते हैं।

दुनिया भर में भारत आम, पपीता, अनार और केले का सबसे बड़ा उत्पादक है और फलों और सब्जियों के उत्पादन में इसका स्थान दूसरा है। इतना उत्पादन के बाद भी फल और सब्जियों का बर्बाद होना बहुत आम बात है और कई रिपोर्ट में ये बात सामने आयी है। 2011 की एक रिपोर्ट के अनुसार करीब 13,000 करोड़ रुपये के फल सब्ज़ी हर साल बर्बाद होते हैं। अगर किसानों के हाथों ये पैसा चला जाए तो शायद उनकी सभी समस्या दूर हो जायेगी।

वृत्ताकार अर्थव्यवस्था के बारे में पूरी जानकारी कोका-कोला इंडिया की तरफ से दी गयी है। कंपनी के काम के बारे में पूरी जानकारी आप www.coca-colaindia.com पर ले सकते हैं।

This article originally appeared on Jagran