सपोर्ट माई स्कूल (एसएमएस) को लोगों तक ले जाने में आम नागरिकों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। तरह तरह के शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता और गांव में काम करने वाले सरपंच जैसे लोग ने एसएमएस के बारे में कोका-कोला और उनके सहयोगियों के साथ काम किया।

छह साल में अब देश के कई हिस्सों में ऐसे सैकड़ों लोग हैं जो स्कूल के बच्चों को ध्यान में रखकर ये काम करने को तैयार हैं। ऐसे कुछ लोगों ने एसएमएस का साथ किस तरह निभाया, उनके बारे में उनके ही शब्दों में कुछ सुनते हैं।

पीपल'स एक्शन फॉर नेशनल इंटीग्रेशन के भारत भूषण ने 20 साल से भी पहले बच्चों के साथ शिक्षा में बदलाव लाने के लिए काम शुरू किया था। उन्होंने बच्चो में सफाई के प्रति विशेष ज़ोर देने के लिए काफी कोशिश की। उत्तर प्रदेश के 19 ज़िलों में काम करने के बाद उनका संपर्क कोका-कोला के सपोर्ट माई स्कूल के कार्यक्रम से हुआ। इस कार्यक्रम के तहत कोका-कोला के साथ काम कर रही दूसरी संस्थाएं भी थी।

भारत भूषण के अनुसार उसके बाद बदलाव लाने की उनकी कोशिश थोड़ी और आसान हो गयी। बच्चों के द्वारा लाये गए इस बदलाव के बारे में उनके ही शब्दों में सुनते हैं...

भारत भूषण, पीपल'स एक्शन फॉर नेशनल इंटीग्रेशन:

“हम लोगों ने बच्चों के लिए ये कैंपेन साथ शुरू किया। बच्चों को हम लोगों ने फोकस किया और ये हम लोगों ने सोचा कि जब बच्चे चाहेंगे तो ऐसा हो पायेगा। बड़े तो बड़े हो गए हैं, उसी आदत में पले-बढ़े हैं, वही सब कर रहे हैं तो बच्चों पर हम लोगों ने फोकस किया और स्कूल से शुरू किया। इसी बीच सपोर्ट माई स्कूल, कोका-कोला, एनडीटीवी, प्लान इंडिया के साथ संपर्क हुआ। शुरुआत तो बहुत पहले हो गयी थी लेकिन उसके बाद कोका-कोला, सपोर्ट माई स्कूल के माध्यम से, एनडीटीवी और प्लान इंडिया ने उस क्षेत्र के लोगों को जिस ढंग से सपोर्ट किया , उससे बदलाव आजकल दिखता है विशेषकर, लड़कियों की शिक्षा में।“

35 कमरों के स्कूल में दिल्ली के सोनिया विहार में लड़कियों के लिए एक सरकारी मॉडल स्कूल काम कर रहा है। इसमें करीब 4500 लड़कियां पढ़ाई करती हैं। पूर्वी दिल्ली के गांव के इलाके में चल रहा ये स्कूल किसी भी आम सरकारी स्कूल की तरह था, जहां सफाई की कमी सबको दिखाई देती थी।

सपोर्ट माई स्कूल से जुड़ने के बाद के कार्यक्रम के तहत वर्ल्ड विज़न इंडिया और कोका-कोला ने इस स्कूल की मदद की। जो बदलाव उसके कारण आया वो अब दिखाई देने लगा है और बच्चों को उसका सीधा फायदा पहुँच रहा है।

निहारिका मौर्या, शिक्षक, सरकारी मॉडल स्कूल, सोनिया विहार, दिल्ली

“हमारे बच्चे, गांव के बच्चे हैं। क्योंकि हमारे यहां ज़्यादातर खेत हैं यहां पर तो बच्चे खेलने कूदने में बहुत अच्छे हैं। उनको फैसिलिटी नहीं मिलती थी, उनको ट्रेनिंग नहीं मिलती थी। लेकिन एक बच्ची (प्रिया गुप्ता) हमारे स्कूल से टायक्वोंडो में पिछले साल नेशनल लेवल पर गोल्ड मैडल लेकर आयी है, वो इस साल फिर गोल्ड मैडल लेकर आयी है। तो काफी बदलाव आया है और वर्ल्ड विज़न ने हमें काफी सारे इक्विपमेंट दिए।“

मध्य प्रदेश के एक युवा सरपंच ने अपने गांव में ऐसा बदलाव लाने में मदद की है जिससे कि उनका गांव अब दूसरे पडोसी गांव के लिए मिसाल बन गया है। सरपंच के साथ मिलकर स्कूल में बदलाव लाने का काम शुरू किया गया।

बच्चों के लिए बैठने के लिए फर्नीचर बदल गया है, अब कई तरह की पढ़ाई प्रोजेक्टर के ज़रिये करवाई जाती है जिससे बच्चों को समझने में बहुत आसानी होती है। इसके अलावा सभी के इस्तेमाल के लिए शौचालय और पीने के पानी का इंतज़ाम भी किया गया.

भारत सिंह खुश्वाहा, सरपंच, चीनौर गांव, मध्य प्रदेश:

"जब ये टीम, कोका-कोला और एसआरएफ वाली, हमारे गांव आयी तो उन्होंने हमारे स्कूल का निरीक्षण किया और निरीक्षण करने के बाद उन्होंने मुझसे कहा कि हम आपके गांव में काम करना चाहते हैं और आपकी हमें मदद की ज़रुरत पड़ेगी। मैंने बोला ये हमारा सौभाग्य है कि आप हमारे गांव में आये और काम करना चाहते हैं। आप मुझे जो करने को बोलेंगे वो मैं करूंगा।"

सरकारी स्कूलों में सुविधाओं के अभाव के कारण जो बच्चे पढ़ाई छोड़ देते थे, वो अब चीनौर के इस गांव में पढ़ने के लिए स्कूल वापस आ रहे हैं। गांव के लोगों को अब सरकारी स्कूलों पर फिर से विश्वास हो गया है और चीनौर के सरपंच इस बदलाव को लाने में काफी मदद कर रहे हैं।

भारत सिंह खुश्वाहा, निहारिका मौर्या, और भारत भूषण जैसे लोग देश भर के कई सरकारी स्कूलों में बदलाव लाने में सहायक हो रहे हैं। उनकी अथक कोशिश की वजह से सपोर्ट माई स्कूल अब नयी उचाइयां छूने के लिए तैयार है।